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अकादमी का इतिहास

अकादमी का इतिहास - केन्द्रीय अकादमी राज्य वन सेवा, कोयंबटूर

केन्द्रीय अकादमी राज्य वन सेवा, कोयंबटूर, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, देहरादून के अधीन वन शिक्षा निदेशालय के अंतर्गत एक प्रमुख संस्थान है, जो विभिन्न राज्यों से नव नियुक्त राज्य वन अधिकारियों को सहायक वन संरक्षक तथा वन राजिक अधिकारी के पद पर व्यावसायिक प्रारंभिक प्रशिक्षण प्रदान करता है तथा उप वन संरक्षक, सहायक वन संरक्षक एवं वन राजिक अधिकारीयों के राज्य वन सेवा अधिकारियों को सेवा-कालीन प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है।

यह अन्य हितधारकों के लिए वनों के महत्व, वन नीति एवं विधि पर सामान्य जागरूकता तथा क्षमता निर्माण पाठ्यक्रम/कार्यशालाएँ भी आयोजित करता है, ताकि वन विभाग और अन्य विभागों के बीच सुगम समन्वय स्थापित हो सके।

अकादमी की स्थापना वर्ष 1980 में की गई थी। इससे पूर्व राज्य वन सेवा अधिकारियों को तत्कालीन भारतीय वन महाविद्यालय, देहरादून तथा राज्य वन सेवा महाविद्यालय, बर्नीहाट में प्रशिक्षित किया जाता था। चतुर्थ और पंचम पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान वानिकी क्षेत्र में विकासात्मक योजनाओं के आगमन और कई राज्यों में सामाजिक वानिकी परियोजनाओं की शुरुआत के साथ, भारत सरकार को विशेष रूप से राज्य सेवाओं के अधिकारियों की बढ़ती संख्या को प्रशिक्षित करने के लिए दो अन्य संस्थान शुरू करने की आवश्यकता महसूस हुई और इसकी अगली कड़ी के रूप में, 25 जनवरी, 1980 को महाविद्यालय की स्थापना की गई।

कोयंबटूर में वन प्रशिक्षण की उत्पत्ति

यह उल्लेखनीय है कि केन्द्रीय अकादमी राज्य वन सेवा, कोयंबटूर ने दक्षिण भारत में वानिकी शिक्षा और प्रशिक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत में वानिकी शिक्षा का प्रारंभ वर्ष 1867 में हुआ था। प्रथम वन महानिरीक्षक सर डिट्रिच ब्रैंडिस की सिफारिशों के आधार पर तत्कालीन उत्तर-पश्चिम प्रांत द्वारा वर्ष 1878 में देहरादून में रेंजर्स और वनपालों को प्रशिक्षित करने हेतु एक वन विद्यालय स्थापित किया गया था। जिसे बाद में भारत सरकार ने अपने अधीन कर लिया और ‘इम्पीरियल फॉरेस्ट कॉलेज’ के रूप में नामित किया।

भारत में वानिकी शिक्षा का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव मद्रास वन विद्यालय की स्थापना थी, जिसे बाद में वर्ष 1912 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी द्वारा कोयंबटूर में मद्रास वन महाविद्यालय के रूप में विकसित किया गया। इसके प्रथम प्रधानाचार्य श्री एफ. एल. सी. काउली ब्राउन, भा.व.से. थे। उस समय कोयंबटूर के वन संरक्षक श्री एफ. ए. लॉज इस महाविद्यालय की स्थापना में प्रमुख रूप से सहायक रहे। यह भारत में देहरादून के बाद दूसरा वन रेंजर महाविद्यालय था। इसे देश में विशेषकर दक्षिण भारत से आने वाले प्रशिक्षित वन अधिकारियों की बढ़ती मांग को पूरा करने हेतु स्थापित किया गया था।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मद्रास वन महाविद्यालय को बंद कर दिया गया था और वर्ष 1945 में इसे श्री सी. आर. रंगनाथन, भा.व.से. द्वारा पुनः प्रारंभ किया गया, जो इसके प्रथम भारतीय प्रधानाचार्य बने। स्वतंत्रता के पश्चात् प्रशिक्षित वन क्षेत्रपालों की बढ़ती मांग को देखते हुए वर्ष 1948 में इसे भारत सरकार ने अपने अधीन कर लिया, ताकि अधिक संख्या में वन क्षेत्रपाल प्रशिक्षुओं को प्रशिक्षण दिया जा सके।

अधिदेश

  • नव नियुक्त राज्य वन सेवा अधिकारियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करना तथा उन्हें क्षमता निर्माण और ज्ञान-साझाकरण के माध्यम से वनों, वन्यजीवों एवं पर्यावरण के क्षेत्र में भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाना।
  • मौजूदा प्रबंधन प्रक्रियाओं को सुदृढ़ करना तथा सेवा-कालीन पाठ्यक्रमों के रूप में सतत शिक्षा के माध्यम से नई अवधारणाओं का प्रसार करना, ताकि उनके प्रबंधकीय कौशल को प्रशासनिक एवं तकनीकी दक्षता के साथ संवर्धित किया जा सके।
  • वानिकी अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी में उभरते मुद्दों को समाहित करते हुए विशेष एवं विषय-आधारित कार्यशालाओं तथा पुनश्चर्या पाठ्यक्रमों का आयोजन करना।
  • वन शिक्षा को पारिस्थितिकी और पर्यावरण के आवश्यक मापदंडों के अनुरूप पुनः उन्मुख करना।
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ऐतिहासिक वन परिसर, जिसमें मद्रास वन महाविद्यालय स्थित था, वर्ष 1955 में ‘सदर्न फॉरेस्ट रेंजर्स कॉलेज’ (एसएफआरसी) बन गया। भारत सरकार के तत्वावधान में, एसएफआरसी से दो वर्ष के कठोर प्रशिक्षण पूर्ण करने के बाद 31 बैचों के वन क्षेत्रपाल उत्तीर्ण हुए। वर्ष 1912 से 1988 के बीच एसएफआरसी ने 4000 से अधिक वन राजिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है। प्रशिक्षुओं में केवल भारत ही नहीं बल्कि श्रीलंका, अफगानिस्तान, युगांडा, मलेशिया, घाना, फिजी, लाओस, सिएरा लियोन, ब्रिटिश गयाना आदि देशों के अधिकारी भी शामिल थे।

भारत सरकार के नीति-निर्णय के अनुसार, सहायक वन संरक्षक के पद से नीचे के वानिकी कार्मिकों को प्रारंभिक एवं सेवा-कालीन प्रशिक्षण प्रदान करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों को सौंपी गई। परिणामस्वरूप, 31.12.1987 को सदर्न फॉरेस्ट रेंजर्स कॉलेज में प्रशिक्षण गतिविधियाँ समाप्त हो गईं।

राज्य वन सेवा अधिकारियों को पूर्ववर्ती भारतीय वन महाविद्यालय, देहरादून तथा राज्य वन सेवा महाविद्यालय, बर्नीहाट में प्रशिक्षित किया जाता था। वन क्षेत्र में चतुर्थ एवं पंचम पंचवर्षीय योजनाओं के दौरान विभिन्न विकासात्मक योजनाओं के आगमन तथा कई राज्यों में सामाजिक वानिकी परियोजनाओं के शुभारंभ के साथ, भारत सरकार ने विशेषकर राज्य सेवाओं से आने वाले अधिकारियों की बढ़ती संख्या को प्रशिक्षित करने हेतु एक अन्य संस्थान स्थापित करने की आवश्यकता महसूस की। इसी क्रम में, राज्य वन सेवा महाविद्यालय, कोयंबटूर की स्थापना दिनांक 25 जनवरी, 1980 को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अधीन वन शिक्षा निदेशालय के तत्वावधान में की गई। बाद में इसका नाम बदलकर केन्द्रीय अकादमी राज्य वन सेवा (के.अ.रा.व.से.) कर दिया गया।

के.अ.रा.व.से., कोयंबटूर को अन्य अकादमियों के साथ एकीकृत दृष्टिकोण के अंतर्गत सभी वन प्रशिक्षण अकादमियों को एक ही आदेशाधीन लाने हेतु, निदेशक, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय वन अकादमी, देहरादून के एकल प्रशासनिक नियंत्रण में लाया गया। (आदेश संख्या 15-15/2018-RT, दिनांक 03-02-2022 द्वारा)।