प्रधानाध्यापक का संदेश
वन अधिकारियों को यह विशिष्ट सौभाग्य प्राप्त हैं कि उन्हें प्रकृति माता की सेवा का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया है। उनका कर्तव्य है कि वे भविष्य हेतु पर्यावरणीय सततता सुनिश्चित करते हुएवर्तमान में समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति करें। जहाँ एक ओर विश्व मानव जाति की एक ही प्रजाति—होमो सेपियन्स—के अस्तित्व एवं कल्याण से जुड़े विकासात्मक मुद्दों में व्यस्त है, वहीं दूसरी ओर वन अधिकारियों पर पृथ्वी पर विद्यमान समस्त वनस्पति एवं जीव-जंतुओं की अन्य प्रजातियों के कल्याण की भारी जिम्मेदारी है।
वानिकी वनों एवं उनसे संबंधित प्राकृतिक संसाधनों के अध्ययन एवं प्रबंधन की कला, विज्ञान तथा व्यवहारिक अनुप्रयोग है। वन अधिकारियों को भूवैज्ञानिकों, कीटविज्ञानियों, जल विज्ञानियों, मृदा वैज्ञानिकों, वन्यजीव जीवविज्ञानियों, पशु चिकित्सकों, मानवविज्ञानियों आदि जैसे विभिन्न विशेषज्ञों के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। इस क्षेत्र की अंतर्निहित विविधता एवं जटिलताओं के कारण ऐसे सहयोगियों की सूची अत्यंत विस्तृत है।
वनाग्नि नियंत्रण, रोजगार सृजन, वनीकरण अभियान, बहुमूल्य प्राकृतिक संपदा का संरक्षण, पारि-पर्यटन को बढ़ावा देना, प्रजातियों के संरक्षण हेतु प्रोत्साहन, काष्ठ एवं अकाष्ठ वन उत्पादका उत्पादन, मृदा एवं जल संरक्षण, ये सभी विविध कार्य एक वन अधिकारी द्वारा संपादित किए जाते है। इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन शमन, वन भूमि के विचलन से संबंधित विकासात्मक दबाव, पर्यावरणीय प्रभाव, मानव–वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण, वन नीति एवं कानून तथा समुदायों की सहभागिता जैसे समकालीन मुद्दे भी एक वन अधिकारी के कुशल एवं प्रभावी कार्य निष्पादन का अभिन्न अंग हैं।
केंद्रीय अकादमी राज्य वन सेवा (कें.अ.रा.व.से.), देहरादून, देश के प्रमुख संस्थानों में से एक है, जो राज्य वन सेवा अधिकारियों को उन सभी कौशलों एवं ज्ञान का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने का दायित्व निभा रही है, जो एक वन अधिकारी के लिए आवश्यक हैं।
श्री ई. विक्रम, भा.व.से.
प्रधानाचार्य
कें.अ.रा.व.से., देहरादून

