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अकादमी का इतिहास

प्रारंभ में भारत के वनों का प्रबंधन सिविल सेवाओं एवं सेना से लिए गए अधिकारियों द्वारा किया जाता था। भारत सरकार के प्रथम वनमहानिरीक्षक डॉ. डिट्रिच ब्रैंडिस ने 1864 में भारत आगमन के पश्चात यह आवश्यकता महसूस की कि देश के वनों के प्रशासन एवं संरक्षण के लिए पूर्णतः योग्य तथा वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की आवश्यकता है। डॉ. ब्रैंडिस ने आरंभिक काल में ही वैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों की एक पूर्ण विकसित सेवा की स्थापना की परिकल्पना की और इसी उद्देश्य से देश के वनों के प्रबंधन हेतु प्रशिक्षित वन अधिकारियों की व्यवस्था हेतु प्रस्ताव प्रस्तुत किए। उन्होंने निम्न अनुशंसा की:

कें.अ.रा.व.से. देहरादून का दृश्य
कें.अ.रा.व.से. देहरादून का दृश्य
  • भारत के वन विभागों में कार्यरत अप्रशिक्षित वन अधिकारियों के लिए यूरोप में वानिकी अध्ययन की सुविधाएँ उपलब्ध कराने का प्रावधान।
  • यूरोप से परिवीक्षाधीन अधिकारियों का चयन कर उन्हें वहीं प्रशिक्षण प्रदान करने की योजना बनाना तथा यूरोप से प्रशिक्षित अधिकारियों को भेजकर भारत के वन विभागों के प्रशासन में स्थायी सुधार हेतु एक समग्र योजना तैयार करना।
  • वर्ष 1867 में, एक भारतीय अभ्यर्थी—बॉम्बे के एक व्यापारी के पुत्र फ्रामजी रुस्तमजी देसाई—सहित पाँच उम्मीदवारों का फ्रांस में प्रशिक्षण हेतु चयन किया गया। चूँकि कुछ अधिकारियों को जर्मनी में भी प्रशिक्षण देना आवश्यक समझा गया, अतः दो अन्य उम्मीदवारों को वन निदेशक बर्कहार्डिट के अधीन प्रशिक्षण के लिए हनोवर भेजा गया। डॉ. ब्रैंडिस द्वारा प्रस्तावित प्रशिक्षण अवधि ढाई वर्ष थी। कुल मिलाकर 1867 से 1886 के मध्य 95 अधिकारियों की भर्ती की गई और उन्हें यूरोप महाद्वीप के जर्मनी, फ्रांस तथा यूनाइटेड किंगडम के कूपर्स हिल, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज एवं एडिनबरा जैसे संस्थानों में प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
  • यद्यपि 1913-14 में इस्लिंगटन आयोग के भारत आगमन के साथ ही भारतीय वन सेवा के परिवीक्षाधीन अधिकारियों को भारत में ही, देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (जो 1906 में स्थापित हुआ था) में प्रशिक्षण देने के प्रश्न पर विचारकिया गया था, तथापि तकनीकी कारणों से इसे अस्वीकार कर दिया गया। फलस्वरूप भारतीय वन सेवा के अधिकारियों का प्रशिक्षण ब्रिटिश विश्वविद्यालयों में ही जारी रहा।
  • युद्ध के तुरंत बाद परिवीक्षाधीन अधिकारियों की मांग में वृद्धि हुई और 1919 से 1923 के मध्य 152 परिवीक्षाधीन अधिकारियों को प्रशिक्षण प्रदान किया गया। भारत सरकार की यह इच्छा थी कि सभी परिवीक्षाधीन अधिकारियों को एक ही केंद्र पर प्रशिक्षण दिया जाए। अंततः इस्लिंगटन आयोग के समर्थन तथा ली आयोग (1923–24) की अनुशंसाओं के आधार पर—जिसमें यह भी सिफारिश की गई थी कि भारतीय वन सेवा में भर्ती 25% यूरोपीय एवं 75% भारतीयों के अनुपात में होनी चाहिए, गवर्नर-जनरल ने 1 नवंबर 1926 से देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान में भारतीय वन सेवा अधिकारियों के प्रशिक्षण का शुभारंभ करने का निर्णय लिया।

देहरादून स्थित भारतीय वन महाविद्यालय (भा.व.म.) की स्थापना वर्ष 1926 में हुई। वर्ष 1926–28 के दौरान आयोजित प्रथम पाठ्यक्रम के प्रथम सत्र में भारत सरकार द्वारा चयनित 2 परिवीक्षाधीन अधिकारियों सहित कुल 12 विद्यार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। यह पाठ्यक्रम वर्ष 1932 तक संचालित रहा, परंतु अधिकारियों की मांग में कमी के कारण इसे बंद करना पड़ा।

वर्ष 1966 में भारतीय वन सेवा का गठन किया गया। भारतीय वन सेवापरिवीक्षाधीन के पहले सत्र में 6 प्रशिक्षु अधिकारी और मलावी, नाइजीरिया, इंडोनेशिया और अफगानिस्तान के 5 विदेशी प्रशिक्षु शामिल थे, जिन्हें 1968-70 के पाठ्यक्रम में भारतीय वन महाविद्यालय, देहरादून में प्रशिक्षण प्रदान किया गया था। बाद में, वर्ष 1987 मेंइस महाविद्यालय का नाम बदलकर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी कर दिया गया। यह अकादमी विभिन्न स्तरों पर भारतीय वन सेवा अधिकारियों के प्रशिक्षण हेतु पूर्णतः समर्पित है।